बटलर और कोल्टर की जोड़ी ने जमाया रंग, हॉलीवुड फिल्मों के शौकीनों के लिए एक्शन का तोहफा..!
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बटलर और कोल्टर की जोड़ी ने जमाया रंग, हॉलीवुड फिल्मों के शौकीनों के लिए एक्शन का तोहफा..!

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सार
फिल्म ‘प्लेन’ इस वीकएंड अपने यार दोस्तों के साथ देखने के लिए सबसे फिट फिल्म है। शुरू से लेकर आखिर तक ये फिल्म आपको बांधे रखती है। साथ में फिल्म ये भी बताती रहती है कि इस दुनिया में क्या कुछ चल रहा है।

विस्तार
साल 2023 की शुरुआत सिनेमाघरों में बहुत ही रोचक तरीके से हुई है। दक्षिण भारतीय सितारों विजय और चिरंजीवी की फिल्में अपनी मूल भाषाओं के साथ हिंदी में भी डब होकर रिलीज हो रही हैं। हिंदी फिल्म निर्माताओं ने अपनी दो नई फिल्में ‘लकड़बग्घा’ और ‘कुत्ते’ पर बॉक्स ऑफिस का दांव लगाया है। और, हॉलीवुड ने भारत में रिलीज की है अपनी एक्शन फिल्म ‘प्लेन’। लायंसगेट की ये भारत में धीरे धीरे अपने पैर जमाने की सधी हुई कोशिश है। बहुत नामचीन सितारे नहीं हैं। फिल्म का बजट भी सीमित है। लेकिन, फिल्म की कहानी चुस्त है। जोर पूरा एक्शन पर है और पूरी फिल्म में कहीं कोई फालतू बात नहीं है। एक घंटे 47 मिनट की ये फिल्म उत्तर भारत की सर्दियों में खून की रफ्तार बढ़ाने में कामयाब रहती है तो पश्चिम और दक्षिण भारत के फिल्म दर्शकों की पसंद पर ये फिट बैठती है।

खराब मौसम में फंसे जहाज की कहानी
एक्शन, थ्रिलर और कॉमेडी विश्वसिनेमा में फिल्मों की कामयाबी के नए अचूक अस्त्र हैं। अच्छी बात ये है कि हॉलीवुड के फिल्म निर्माता अपनी फिल्मों की श्रेणियों के बारे में पहले फ्रेम से स्पष्ट रहते हैं और अपने लक्ष्य पर टिके रहते हैं। फिल्म ‘प्लेन’ की कहानी बहुत साफ सुथरी है। दर्शकों को रिझाने के लिए सस्ते टोटके नहीं हैं। शुरू से लेकर आखिर तक कुछ है तो बस रोमांच और रोमांच। कहानी नया साल शुरू होने के माहौल की ही है। पायलट टोरैंस और को पायलट डेल मुसाफिरों को लेकर उड़ान भरने वाले हैं। रास्ते में पड़ने वाले खराब मौसम के बारे में वह आशंकित हैं। भरोसा दिया जाता है कि जब तक वह उस इलाके में पहुंचेंगे मौसम साफ हो जाएगा। पर, ऐसा होता नहीं है। आसमान में उड़ते जहाज पर बिजली गिरती है। मशीनें खराब होती हैं और समुद्र में गिरते गिरते बचे जहाज को टोरैंस एक अनजान द्वीप पर दिखने वाली सड़क पर उतारने में कामयाब रहता है। बाहरी दुनिया से इनका संपर्क कट चुका है। और, द्वीप पर मौजूद लड़ाके इन यात्रियों का अपहरण कर लेते हैं।

खदानों की सियासत पर पैनी नजर
फिल्म ‘प्लेन’ इस वीकएंड अपने यार दोस्तों के साथ देखने के लिए सबसे फिट फिल्म है। शुरू से लेकर आखिर तक ये फिल्म आपको बांधे रखती है। साथ में फिल्म ये भी बताती रहती है कि इस दुनिया में क्या कुछ चल रहा है। कॉरपोरेट कंपनियों के मुनाफे के जुगाड़ में इंसानी जानों की कीमत कुछ भी नहीं है। उनको बस कम से कम दूरी में हवाई जहाज उड़ा देना है। हवाई जहाज यात्रियों समेत गायब हो जाए तो हवाई कंपनियों की पहली प्राथमिकता क्या होती है, ये भी ये फिल्म बताती है। कारोबारी प्राथमिकताओं के साथ फिल्म फिल्म ‘प्लेन’ सामाजिक, राजनीतिक विषमताओं पर भी कहानी की अंतर्धारा के रूप में टिप्पणियां करती चलती है। जहां ये जहाज उतारना पड़ा है, वह सड़क द्वीप पर बनी खदानों के लिए है। दुनिया में जहां जहां खदानें हैं, वहीं वहीं उनके आसपास सशस्त्र लड़ाके भी मिलते हैं। इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि कोई जहाज अगर बस्तर या दंतेवाड़ा के जंगलों में उतारना पड़ जाए और उसके मुसाफिर वहां के नक्सलियों के हाथ लग जाए, तो फिर क्या होगा?

बटलर और कोल्टर की जोड़ी का कमाल
और, इस सबके बाद फिल्म ‘प्लेन’ का असल सरप्राइज आइटम हैं अभिनेता माइक कोल्टर। जहाज उड़ने को होता है पहले उन्हीं की एंट्री होती है। हाथों में हथकड़ी। साथ में एक अफसर और सीट सबसे पीछे की। पायलट श्वेत है। कैदी अश्वेत। भावनाएं क्या निकलेंगी, सहज समझा जा सकता है। लेकिन, मुसीबत में इंसान ही इंसान के काम आता है। रंगभेद तभी तक है जब तक दोनों में किसी एक का जीवन आसान है। बंधन टूटते हैं तो मुक्ति का रास्ता खुलता है। गैस्पेयर के किरदार में अगर कोल्टर ने बढ़िया काम किया है तो टोरैंस के किरदार में 53 साल के बटलर ने खूब तालियां पाई हैं। पहले खराब मौसम में फंसे जहाज के मुसाफिरों को धरती पर सुरक्षित लाना, फिर अपहरणकर्ताओं के फंसे यात्रियों को छुड़ाने के लिए जान पर खेल जाना और फिर उन्हें एक क्षतिग्रस्त जहाज में वापस बिठाकर द्वीप से उड़ान भर जाना, सब कुछ किसी कॉमिक बुक जैसा है।

नए साल का जोश बढ़ाती फिल्म
कहानियां लिखने वालों के लिए मौजूदा समय जैसा बढ़िया समय शायद ही पहले कभी रहा हो। फिल्म ‘प्लेन’ की कहानी चार्ल्स कमिंग ने कोई छह साल पहले बहुत ही बढ़िया दामों पर बेची थी। फिर ये कहानी तमाम मालिक बदलती रही। लायंसगेट ने भी साल 2020 में इस पर काम करने का इरादा छोड़ दिया था। लेकिन कोरोना पर काबू पाया गया तो इस कहानी की भी तकदीर फिर से जागी। जान फ्रांसवा रिचेट ने बतौर निर्देशक एक बहुत सधी हुई एक्शन फिल्म बनाई है और इसके पहले फ्रेम से लेकर आखिरी फ्रेम तक उनकी पकड़ फिल्म पर हर पल बनी रहती है। यही फिल्म ‘प्लेन’ को देखने की असल वजह भी है। फिल्म का छायांकन, संपादन और पार्श्व संगीत सब बढ़िया है। मौका निकालकर इसे नजदीकी पीवीआर सिनेमाघर में देखिएगा जरूर।

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